व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं । आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थ साधनम्।।
व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं । आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थ साधनम्।।
॥ आज का चिंतन ॥Jun 21, 2020
सामान्य अर्थों में शरीर को निरोग बनाने की प्रक्रिया विशेष ही योग कहलाती है, जिसे हम व्यायाम भी कह सकते हैं।
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व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं ।आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थ साधनम्।।
हमारे शास्त्र कहते हैं कि व्यायाम हमें स्वस्थ करता है अथवा हमारे स्वास्थ्य में वृद्धि करता है। स्वास्थ्य में वृद्धि होती है तो लंबी आयु अर्थात् दीर्घायु की प्राप्ति होती है और साथ ही शरीर को बल की प्राप्ति होती है अर्थात् शरीर बलिष्ठ होता है व शरीर बलिष्ठ होता है तो इन सभी के संयोग से मनुष्य को जीवन में परम सुख की प्राप्ति होती है।
इसलिए ही निरोगी काया को परम भाग्य की प्राप्ति भी कही गई है क्योंकि निरोगी काया अर्थात् स्वस्थ शरीर और स्वस्थ शरीर से ही जीवन के सभी कार्य सिद्ध होते हैं अर्थात् सभी वांछित कामनाओं की पूर्ति संभव होती है। सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
लेकिन शास्त्रों और महापुरुषों ने योग शब्द को केवल तन की स्वस्थता तक ही सीमित नहीं रखा है। शास्त्रों ने उद्घोष किया है कि तन की नहीं अपितु तन और मन की स्वस्थता ही योग है। स्वस्थ मन ही उस परम सत्ता से किसी जीव का योग कराने वाला होता है और उस परम सत्ता से योग ही जीवन की परिपूर्णता भी है।
योग का सीधा सा अर्थ होता है जुड़ना। व्यक्ति से, परिवार से, समाज से, वंचितों से, दीनों से, दुखियों से, असहायों से और स्वयं के साथ - साथ स्वयंभू से अर्थात् उस परम सत्ता से जुड़ना ही योग है।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून की समस्त विश्व को बहुत - बहुत शुभकामनाएं एवं बधाइयाँ! आओ! योग अपनाकर अपने तन और मन को स्वस्थ बनाते हुए अपने जीवन को आनंदमय बनाते हैं।
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